देश की इकलौती उर्दू यूनिवर्सिटी में 40 फीसदी टीचर उर्दू जानते ही नहीं

 
हैदराबाद

हैदराबाद में मौलाना आजाद नैशनल उर्दू यूनिवर्सिटी ने बुनियादी उर्दू में छह महीने का सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किया था। सर्टिफिकेट कोर्स से ऐसा लगेगा कि भाषा सीखने के इच्छुक नए विद्यार्थियों के लिए यह कोर्स शुरू किया गया होगा। पर, ऐसा नहीं है। यह कोर्स यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले टीचर्स के लिए शुरू किया गया। यह इसलिए कि ऐसा दावा है कि देश के एकमात्र इस उर्दू विश्वविद्यालय में 50 फीसदी टीचर उर्दू या उर्दू में अन्य विषयों को नहीं पढ़ा सकते।
कुछ लोगों का यहां तक दावा है कि खुद कुलपति मोहम्मद असलम परवेज ने यह दावा किया है कि 40 फीसदी फैकल्टी उर्दू में सक्षम नहीं है। हालांकि इस दावे की हम पुष्टि नहीं करते हैं। यूनिवर्सिटी के एक वरिष्ठ टीचर कहते हैं, 'वास्तव में, प्रतिशत बहुत अधिक है। इनमें से कई के पास दावा करने के लिए प्रमाण पत्र हैं, लेकिन उन्हें उर्दू में दो लाइनें लिखने के लिए कहें तो वे सफल नहीं होंगे।'

1998 में स्थापित यह यूनिवर्सिटी अपने आधिकारिक वेबसाइट पर लिखता है, 'उर्दू भाषा को बढ़ावा देना और विकसित करना, पारंपरिक और दूरस्थ मोड के माध्यम से उर्दू माध्यम में व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा प्रदान करना हमारा उद्देश्य है।' 20 साल बाद भी स्थिति जस की तस है। छात्रों का कहना है कि कई पाठ्यक्रम अभी भी अंग्रेजी पाठ्यपुस्तकों के साथ पढ़ाए जाते हैं।

'यूनिवर्सिटी में कोई समक्ष नहीं मिला'
विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि पाठ्यक्रम शुरू करने से पहले उर्दू की पाठ्यपुस्तकों को जगह दी जाए। हमारे सहयोगी  से बातचीत में कुलपति ने कहा, 'सभी 50 पुस्तकों का हमने अनुवाद किया है जो बाहर से विशेषज्ञों द्वारा किए गए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मुझे ऐसा करने के लिए विश्वविद्यालय से कोई नहीं मिला।

'गलत समय पर सही बात कर रहे हैं कुलपति'
उधर, चांसलर फिरोज बख्त अहमद कहते हैं, मेरे पास कुलपति के दावे की पुष्टि करने के लिए डेटा नहीं है, लेकिन अगर यह सच है, तो वह गलत समय पर सही बात कह रहे हैं।
 

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