पुस्तक पढ़कर नहीं हो सकता व्यक्तित्व निर्माण – दीदी मंदाकिनी
रायपुर
पुस्तक पढ़कर नहीं हो सकता व्यक्तित्व का निर्माण। पुस्तक से मिली ज्ञान या डिग्री, जीवन प्रबंधन के लिए यथेष्ट नहीं है। व्यक्तित्व का निर्माण, सुपात्र गढ?ा और आत्मप्रबंधन करना है तो यह एक कुशल गुरू के द्वारा ही संभव है। श्री हनुमान चालीसा में निहित साधना के सूत्र आज इक्कीसवीं सदी में भी प्रासंगिक है। सेवाधर्म कैसे की जाती है,यह हनुमान जी सीखें।
युग तुलसी रामकिंकर जी महाराज की उत्तराधिकारी दीदी मंदाकिनी ने हनुमान चालीसा के प्रसंगवश बताया कि रावण विद्वान था और हनुमान विद्यावान। विद्या के दो प्रकार होते हैं परा और अपरा विद्या। परा विद्या के द्वारा व्यक्ति ब्रम्ह ज्ञान प्राप्त कर सकता है और अपरा विद्या के द्वारा भौतिक जगत का ज्ञान मिलता है। दोनों के लिए कोई सिखाने पढ़ाने वाला चाहिए। स्कूल कालेज में बच्चों को शिक्षा दी जाती है और गुरूकुल में जिज्ञासु साधकों को दीक्षा। शिक्षा और दीक्षा में जो सूक्ष्म अंतर है, वही तो श्री हनुमान जी का चरित्र के द्वारा प्रगट होता है।
गोस्वामी जी जब प्रारंभ में ही गुरु वंदना करते हैं तो वह एक औपचारिकता मात्र नहीं हैं। वे गुरू चरणों की तुलना कमल से करते हुए चरण रज की याचना करते हैंं क्योकि अन्हे मालूम हैं कि उस रज में ऐसा चमत्कार है कि उनकी बंद आंखें खुल जायेगी। सांसारिक रज यदि आंखों में पड़ जाए तो खुले नेत्र भी बंद हो जायेंगे। वे चरण रज को अपने आज्ञा चक्र में लगाने का संकेत देते है कि यदि तुम्हे ब्रम्ह विद्या प्राप्त करना है तो गुरु चरणों में प्रस्तुत होने की विधि का पालन करना चाहिए। जो ज्ञान संसार के किसी पुरूषार्थ या वस्तु के द्वारा खरीदा नहीं जा सकता, उस अमृतमय ज्ञान को सदगुरू की कृपा से ही कोई शिष्य प्राप्त कर सकता है।
उन्होने बताया कि गुरु की कृपा से ही व्यक्ति के ह्दय में सुशुप्त प्रतिभा और शक्तियां जागृत व चैतन्य हो जाती है। जो उनके समस्त स्वार्थ और परमार्थ की कामना को सफल साकार बना देती है। गोस्वामी तुलसीदासजी को भी भगवान श्री राम की प्राप्ति श्री हनुमान जी कृपा से हुई। इसलिए वे सदगुरू रुपी श्री हनुमान जी के चरणों में नत होकर कृतज्ञता भरे स्वर में उनका सुयश ज्ञान करते हैं।
