रिश्ता बचाएँ या आत्मसम्मान? प्रेमानंद जी महाराज की बात बदल देगी आपकी सोच

जीवन में कई बार ऐसा मोड़ आ जाता है, जब समझ ही नहीं आता कि क्या करना सही रहेगा। खासतौर से जब बात उन रिश्तों की हो, जो हमारे दिल के बेहद करीब होते हैं। कई बार हम रिश्ता बचाना भी चाहते हैं, फिर हमें कहीं ना कहीं ये भी लगने लगता है कि अपना आत्मसम्मान बचाना ज्यादा जरूरी है। रिश्ते और आत्मसम्मान के बीच की ये कश्मकश चलती रहती है और कुछ हाथ नहीं लगता। प्रेमानंद जी महाराज के सत्संग में उनसे किसी ने यही सवाल किया कि रिश्ता अगर बिखर रहा हो तो आत्मसम्मान ज्यादा जरूरी है या फिर उस रिश्ते को बचाना। महाराज ने इसका जो उत्तर दिया है, वो वाकई हर किसी को जरूर सुनना चाहिए।

रिश्ता या आत्मसम्मान, क्या जरूरी है?
प्रेमानंद जी महाराज इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि आप जिस आत्म सम्मान की बात कर रहे हैं, वो कुछ नहीं बल्कि देहाभिमान है। इस अभिमान को मिटाकर ही रिश्तों का पोषण किया जा सकता है। अगर आप रिश्ते के बीच में इसे ले कर आते हैं, तो कभी ना कभी खटास होना तय है। आत्मसम्मान देव स्वरूप है लेकिन जो हमें आत्मसम्मान लगता है, वो ज्यादातर देहाभिमान होता है, जिसे सही नहीं माना गया है।इस देहाभिमान को मिटाकर हमें रिश्ता बचाना चाहिए।

मान रहित हो कर सबका मान करें
महाराज जी शास्त्रों में कहे गए एक श्लोक को दोहराते हुए बताते हैं कि जब आप मान रहित हो कर सबका मान करेंगे, तो रिश्ते अपने आप उज्ज्वल हो जाएंगे। वहीं जब हम अपने सम्मान की बात रखेंगे, तो रिश्ते में कहीं ना कहीं खटास आ ही जाएगी। इससे बेवजह आपका मन अशांत रहेगा और बेचैनी भी होगी। इसलिए शास्त्रों की सिद्धांत के अनुसार आपको अमानी यानी मान रहित होना चाहिए।

ये होता है असली आत्मसम्मान
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि असली आत्मसम्मान वो होता है, जब सामने वाला आपसे कटु वचन कहे और आप फिर भी उसे प्यार से ही जवाब दें। ऐसे में आप खुद को किसी और के लिए नहीं बदलते हैं। ऐसे लोगों को भले ही कोई ना देख रहा हो लेकिन भगवान देख रहे होते हैं और जिससे भगवान प्रेम करें उससे दुनिया प्रेम करती है।