नीतीश कुमार का 21 साल का कार्यकाल, 10 बार सीएम बने, 6 बार दिया इस्तीफा
पटना
नीतीश कुमार मंगलवार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे और गुरुवार को यानी 15 अप्रैल को बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार बन जाएगी. 2025 विधानसभा चुनाव में दो तिहाई से अधिक बहुमत से जीते NDA की सरकार बने अभी 5 महीने ही हुए थे कि एक बार फिर सरकार बनने की कवायद की जा रही है. इसके साथ बिहार में नीतीश कुमार के युग का अंत माना जा रहा है।
भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार का सियासी सफर मील की पत्थर की तरह है, दो दशक से बिहार की राजनीति उनके इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. पिछले चार साल से हर साल नीतीश कुमार शपथ ले रहे हैं।
साल 2005 में पहली बार नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, उसके बाद से चार बार चुनाव हुए हैं, लेकिन नीतीश कुमार ने 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. ये अपने आपमें एक रिकॉर्ड है, लेकिन साथ ही छह बार मुख्यमंत्री से इस्तीफा देने का काम भी किया है, जो किसी भारतीय राजनेता के लिए अनोखा रिकार्ड है।
चार साल में चार बार नीतीश ने ली शपथ
नीतीश कुमार ने 10 अप्रैल को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली है, उससे पहले नंवबर 2025 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. इसके अलावा 2024 लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने विपक्षी इंडिया गठबंधन से नाता तोड़कर बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए से हाथ मिला लिया था।
जनवरी 2024 में नीतीश ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. इससे पहले उन्होंने 2022 में उन्होंने बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए से गठबंधन तोड़कर आरजेडी और कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया था. इस तरह चार साल में चार बार शपथ लेने का रिकार्ड है, जिसमें तीन बार सीएम और एक बार राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ लेने का काम किया।
10 बार सीएम बने और 6 बार इस्तीफा
नीतीश कुमार साल 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के चलते एक सप्ताह के बाद ही इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद दोबारा 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपनी सियासी जड़े ऐसी जमाई कि दो दशक तक बिहार की सत्ता उनके इर्द-गिर्द सिमटी रही है. इस तरह 10 बार सीएम पद की शपथ और 6 बार इस्तीफा देने का यह दोहरा रिकॉर्ड नीतीश कुमार के नाम दर्ज है. यह सिर्फ सत्ता में बने रहने का ही नहीं बल्कि ऐसा पैटर्न दिखाता है कि पद छोड़ने के बाद भी उनकी राजनीतिक समीकरण ही सत्ता में बनाए रखा।
नीतीश कुमार पहली बार 3 मार्च, 2000 को मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन वह सरकार सिर्फ़ कुछ ही दिनों तक चल पाई. ऐसे में बहुमत साबित करने में नाकाम रहने के बाद, उन्होंने 10 मार्च, 2000 को इस्तीफ़ा दे दिया. हालांकि, इस शुरुआती असफलता से उनके राजनीतिक उभार पर कोई रोक नहीं लगी. 2005 में, वह दोबारा सत्ता में लौटे और तब से लेकर अब तक बिहार की राजनीति में एक केंद्रीय हस्ती बने हुए हैं।
2005 के बाद से सत्ता की धुरी बने नीतीश
साल 2005 के बाद से बिहार की राजनीति के नीतीश कुमार सियासी धुरी बने हुए हैं. 2005 से उनकी राजनीतिक यात्रा एक चक्र की तरह चलती रही है इस्तीफ़ा देना, नए गठबंधन बनाना और फिर सत्ता में लौटना. समय के साथ यह पैटर्न और भी साफ़ होता गया. साल 2010 में नीतीश कुमार तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी, लेकिन 2013 में बीजेपी के साथ उनके रिश्ते खराब हो गए।
साल 2014 में, लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी के ख़राब प्रदर्शन की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन फ़रवरी 2015 में, जीतन राम मांझी को हटाकर, उन्होंने चौथी बार फिर से मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. साल 2015 में, विधानसभा चुनावों के बाद, RJD के साथ गठबंधन करके उन्होंने पांचवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली।
2017 में, 'महागठबंधन' से रिश्ते तोड़ने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर, NDA के साथ मिलकर छठी बार मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेते हुए वह दोबारा सत्ता में लौट आए. 2020 के विधानसभा चुनावों के बाद उन्होंने 7वीं बार CM पद की शपथ ली. 2022 में, उन्होंने NDA छोड़कर और विपक्षी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाते हुए फिर से इस्तीफ़ा दे दिया, और 8वीं बार CM पद की शपथ ली।
2024 में भी यही सिलसिला फिर दोहराया गया, जब उन्होंने महागठबंधन छोड़ दिया और वापस NDA में चले गए. इस तरह नीतीश कुमार 9वीं बार CM पद की शपथ ली; और आख़िरकार, 2025 के विधानसभा चुनावों के बाद उन्होंने 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने का काम किया. इस तरह उन्होंने एक रिकार्ड अपने नाम किया।
नीतीश कुमार के हर इस्तीफा सियासी चाल
नीतीश कुमार ने अपने सियासी सफर में इस्तीफा देने का रास्ता सिर्फ एक राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चाल भी थी. इसने नीतीश कुमार को अपने गठबंधन नए सिरे से बनाने और सत्ता में बने रहने का मौक़ा दिया. इसीलिए उनका रिकॉर्ड सिर्फ़ आंकड़ों के बारे में नहीं, बल्कि राजनीति की एक अनोखी शैली के बारे में है।
नीतीश के राजनीति में एक और अहम बात इस कहानी को एक नया पहलू देती है. नीतीश कुमार ने कभी भी अपनी पार्टी की ताक़त पर अकेले दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं किया है. उनकी पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), सरकार बनाने के लिए हमेशा अपने गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर रही है. चाहे वह NDA के तहत भारतीय जनता पार्टी के साथ हो, या महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ, गठबंधन ही उनके शासन की रीढ़ रहे हैं।
नीतीश को अकेले दम बहुमत नहीं मिला
नीतीश कुमार भले ही 21 साल तक बिहार की राजनीति के बेताज बादशाह रहे हों, लेकिन एक बार भी अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा हासिल नहीं कर सके. 2010 में भी, जब उनकी सरकार को बहुत मज़बूत माना जा रहा था, तब भी जीत गठबंधन की थी, न कि अकेले JD(U) की. 2010 में JD(U) ने 115 सीटें हासिल की थीं. जो पिछले 20 सालों में JD(U) का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन था, लेकिन फिर भी वे 122 के जादुई आंकड़े से 7 सीटें पीछे रह गए थे।
2020 में, उनकी पार्टी की सीटों की संख्या कम होने से यह निर्भरता और भी साफ़ तौर पर सामने आ गई. एक तरफ़ तो वह सुर्ख़ियों वाला आंकड़ा है. मुख्यमंत्री के तौर पर 10 बार शपथ लेना तर दूसरी तरफ़, एक और उतना ही चौंकाने वाला आंकड़ा है, उसी पद से 6 बार इस्तीफ़ा देना. उनके राजनीतिक जीवन में एक ऐसा रिकॉर्ड जिसकी फ़िलहाल कोई बराबरी नहीं है।
नीतीश कुमार के समर्थकों का कहना है कि यह बदलती हुई परिस्थितियों के बावजूद बिहार में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने की उनकी लचक और काबिलियत को दिखाता है. वहीं, आलोचकों का तर्क है कि बार-बार इस्तीफ़ा देना और गठबंधन बदलना, उनकी निरंतरता और जनादेश को लेकर कई सवाल खड़े करता है. इन सब के बीच इस बहस से परे, एक बात बिल्कुल साफ़ है. नीतीश कुमार ने एक ऐसा राजनीतिक मॉडल तैयार किया है, जिसमें सत्ता किसी एक जनादेश के बल पर नहीं, बल्कि गठबंधन को साधकर और अपने फ़ैसलों का समय-निर्धारण बेहद सावधानी से करके बरक़रार रखी जाती है।
